पता : कन्या गुरुकुल महाविद्यालय,
60, राजपुर रोड, देहरादून
टेलीफोन : +91-135-2748334
ईमेल : info@kgmdoon.com

विकास

ईश्वर का धन्यवाद है कि कन्या गुरूकुल जो अपने शैशवकाल में प्रथम चार श्रेणियों से किराए की कोठियों में आरम्भ हुआ था वह इसके कार्यकर्ताओं के परिश्रम एवं लगन के फलस्वरूप विगत 86 वर्षो में भारत का एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय-महाविद्यालय बन चुका है और उसका स्वकीय स्थान भी हो गया है, जोकि समस्त भूमि तथा भवनों के मूल्य को लगाकर 2 करोड़ रूपये के लगभग है। इस कुल में वैदिक और अर्वाचीन-साहित्य के साथ साथ गृह-विज्ञान, अंग्रेजी, शिल्पकला, संगीत, इतिहास, भूगोल, गणित, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, ड्राइंग, गृह-चिकित्सा तथा विज्ञान, अर्वाचीन विज्ञानों की शिक्षा राष्ट्र-भाषा हिन्दी के माध्यम द्वारा दी जाती है। गुरूकुल में उच्च मानसिक उन्नति के साथ-साथ ब्रह्नाचर्य के नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए व्यायामादि द्वारा शारीरिक-उन्नति के लिए विशेष-रूप से उद्योग किया जाता है।

कन्या गुरूकुल को वर्तमान उन्नत-अवस्था तक लाने में यहाॅ की सर्व-प्रथम आचार्या कुमारी विद्यावती जी सेठ का योगदान गुरूकुल के इतिहास में सदैव स्वर्णिम अक्षरों में लिखा रहेगा। आपने अपना सम्पूर्ण यौवन उसके निर्माण में लगा दिया। उनके हाथ का लगाया हुआ यह पौधा आज विशाल वृक्ष बन गया है। यह उनकी तपस्या तथा कर्मठता का ज्चलन्त प्रतीक है।

गुरूकुल को महाविद्यालय का रूप देने का सर्वाधिक श्रेय स्वर्गीय श्री आचार्य रामदेव जी के अथक परिश्रम प्रयत्नों को ही है। महाविद्यालय के प्रारम्भ करने पर शिक्षिकाओं के अभाव में वह स्वयं महाविद्यालय की कन्याओं को मनोविज्ञान, इतिहास, सामान्य-ज्ञान तथा आर्य सिद्धान्त आदि विषय पढ़ाते रहे। कन्याओं के ज्ञान वर्धन की ओर उनकी बहुत लगन थी।

स्वर्गीय आचार्य रामदेव जी के त्याग तप तथा बलिदान स्वरूप उनके अदम्य उत्साह एवं अहर्निश परिश्रम से यह संस्था इस स्थिति तक पहुंच सकी है। श्री आचार्य रामदेव जी की सेवाओं की छाप आर्य-समाज के प्रत्येक क्षेत्र में दृष्टिगोचर हो रही है्र। तथापि अपने जीवन के अन्तिम काल में गुरूकुल कांगड़ी को एक सफल विश्व विद्यालय का रूप देकर और उसे आर्थिक दृष्टि से दृढ़ करने में अपना पूर्ण सहयोग देने के पश्चात उन्होंने अपना समय कन्या गुरूकुल को उन्नत करने में लगाया। उनके अनथक परिश्रम के परिणाम स्वरूप ही आज कन्या गुरूकुल को अखिल भारतीय रूप मिला है। कन्या गुरूकुल के लिए धन संग्रह करने में उन्होंने दिनरात, सर्दी-गर्मी तथा अपने आराम की तनिक भी चिन्ता नहीं की। उन्होंने अपने स्वास्थ्य का ध्यान न रखा और अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करने के कारण 58 वर्ष की अल्प आयु में ही उनका स्वर्गवास हो गया। वास्तव में कन्या गुरूकुल की चिन्ता में ही उनके प्राण गये। राष्ट्रपिता महात्मा गाॅधी के शब्दों में कन्या गुरूकुल ही स्वर्गीय आचार्य रामदेव जी का सच्चा स्मारक है और इसे आर्थिक दृष्टि से निश्चित बनाना आर्य पुरूषों का कर्तव्य है। इस समय हमें कन्या गुरूकुल के लिये आवश्यक भवन बनाने के लिये कम से कम 50 लाख रूपये की आवश्यकता है।

सन 1945 तक श्री पं0 सोमदत्त जी वि0अ0 ने सहायक मुख्याधिष्ठाता के पद से, श्रीमती चन्द्रावती जी लखनपाल के आचार्या पद से तथा श्री पं0 सत्यव्रत जी सिद्धान्तानलंकार ने व्यवस्थापक के पद से इस संस्था के विकास में प्रशंसनीय सहयोग दिया है। 1951 से 1957 तक स्वर्गीय पं0 श्री ठाकुरदास जी शर्मा वैद्य अमृतधारा ने मुख्याधिष्ठाता के रूप में गुरूकुल की जो अवैतनिक सेवा की है वह सदा स्मरणीय रहेगी।

सन् 1957 से 31 मई 1963 तक श्री पं0 यशपाल जी सिद्धान्तालंकार ने मुख्याधिष्ठाता तथा व्यवस्थापक के पद पर रहकर इस संस्था के विकास में अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने इस कुल की सेवा अनथक लगन तथा परिश्रम से की है।

स्व0 आचार्य रामदेव जी की सुपुत्री श्रीमती दमयन्ती जी कपूर सन 1953 से आचार्य के पद पर कार्य कर रही है। आप निरन्तर गुरूकुल की उन्नति के लिये प्रयत्नशील रहती है।


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